॥न भूतो न भविष्यति, ऐसे थे हमारे अटल जी॥

भारत के राजनैतिक नभमंडल के शुभ शीतल शशांक, बहुआयामी व्यक्तित्व, विलक्षण प्रतिभा के धनी, कविह्रदय, महान नेता, भारतरत्न, व पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई अब हमारे बीच नहीं रहे। भारतीय लोकतंत्र में गैर कांग्रेसवाद का सबसे मुखर स्वर। सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक। हार नहीं मानूंगा का एलान करते करते सदी का हस्ताक्षर आखिरकार महाकाल से हार गया।

अटल बिहारी बाजपेयी जी का भारतीय चिंतन विचार और राजनीति के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान को देश सदैव याद रखेगा। सवाल यह है कि अटलजी का कौन सा रूप याद रखा जाए? एक स्वतंत्रता सेनानी या एक साहित्यकार, एक पत्रकार या एक विलक्षण राजनेता, एक महान देशभक्त या हिंदी भाषा का सेवक, सबको साथ लेकर चलने वाला प्रधानमंत्री या कठिन से कठिन क्षणों में अपना राजधर्म न छोड़ने वाला संकल्पशील महापुरुष, एक ईमानदार भारतीय या फिर इन सबसे ऊपर एक सच्चा इंसान। एक व्यक्ति में इतने सारे रूपों का समावेश आज के विश्व में दुर्लभ संयोग है। लंबे समय तक इस शून्य को भरना नामुमकिन सा है। उनकी निष्ठा निस्पृहता एवं निर्भीकता और निर्मल विचार हमें याद आएंगे। बाजपेयी जी ने चारित्रिक उदारता के प्रखर प्रकाश में प्रगति और प्रतिष्ठा के जिस सर्वोच्च शिखर पथ का संधान किया है, वह सचमुच में अनूप में है। कहते हैं कि भारतीय राजनीति के तपोवन में विनम्रता सच्चाई तथा त्याग का मंत्र उच्चारण करने वाले इस महामहिम राजनीतिक ऋषि और आधुनिक भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह को कोटि-कोटि नमन प्राप्त है। अटल जी सशरीर भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन एक दयालु, सदभाव-शांति के पुजारी और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर उनका व्यक्तित्व हमेशा हमारे बीच रहेगा। वे युगपुरुष थे और युगपुरुष कभी नहीं मरा करते।

ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में अटल जी का जन्म हुआ। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी जी एक स्कूल टीचर थे। अटल जी का शुरुआती सफर मुश्किलों भरा रहा। अटल जी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कॉलेज और कानपुर के डी॰ए॰वी॰ कॉलेज में हुई। उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता से अपना करियर शुरु किया। उन्होंने ‘राष्ट्र धर्म’, ‘पाञ्चजन्य’ और ‘वीर अर्जुन’पत्रिकाओं का संपादन किया। उन्होंने अपना सामाजिक जीवन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारम्भ किया था और देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचने तक उस संकल्प को पूरी निष्ठा से निभाया।

वाजपेयी जी जब 10वीं कक्षा के छात्र थे उस समय उन्होंने अपने बारे में एक कविता लिखी थी, ‘हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय’। इसे पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि अपनी पहचान को लेकर वाजपेयी जी कभी दुविधा में थे। संयम और शिष्टता ये उनके ऐसा गुण थे जो उन्हें अपने ही दल, भारतीय जनता पार्टी में औरों से अलग करते थे। वाजपेयी जी अपने इन गुणों का श्रेय अपनी हिंदू पृष्ठभूमि को देते रहे।

1984 के संसदीय चुनावों में ग्वालियर सीट पर माधव राव सिंधिया से हारने के बाद बाजपेयी जी ने इसी कविता का जिक्र करते हुए कहा था,‘लोग कहते हैं वह वाजपेयी जिसने वह कविता लिखी थी और वह जो राजनीति करता है दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं। लेकिन यह सच नहीं है। मैं हिंदू हूँ। मैं यह कैसे भूल सकता हूँ? किसी और को भी यह नहीं भूलना चाहिए। हालांकि मेरा हिंदुत्व संकीर्ण नहीं है।’

2001 में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए उन्होंने न्यूयॉर्क में कहा था, ‘आज प्रधानमंत्री हूँ, कल नहीं रहूँगा लेकिन संघ का स्वयंसेवक पहले भी था और आगे भी रहूँगा।’उनकी ये बात बिल्कुल सच्ची, सही और पक्की है। बाजपेयी जी संघ के समर्पित प्रचारक थे, उन्हें आर॰एस॰एस॰ ने जनसंघ में काम करने के लिए भेजा था, वे मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री बने जबकि आडवाणी जी सूचना-प्रसारण मंत्री, 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था। आगे चलकर समाजवादी धड़े के लोगों, ख़ास तौर से जॉर्ज फर्नांडिस ने ये मुद्दा उठाया कि दोहरी सदस्यता नहीं होनी चाहिए, यानी जो लोग जनता पार्टी में हैं वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं होने चाहिए, संघ के प्रति ये वाजपेयी जी व आडवाणी जी का समर्पण ही था कि उन्होंने सरकार छोड़ दी लेकिन संघ छोड़ने को राजी नहीं हुए।

भारतीय राजनीति में वाजपेयी जी एक प्रमुख हस्ताक्षर बनकर उभरे और राजनीति के उतार-चढ़ावों के बीच उन्होंने ऐसी पद प्रतिष्ठा पाई कि न केवल उनकी अपनी पार्टी और सहयोगी दल बल्कि विपक्षी भी उनसे दिल खोलकर गले मिलते थे।

अंग्रेजी के वह धाराप्रवाह वक्ता थे लेकिन उनकी आत्मा हिंदी में बसती थी,जब वह हिंदी में अपने विशिष्ट अंदाज में लंबे अंतरालों के साथ भाषण देते थे तो लगता था उनकी जिह्वा पर देवी सरस्वती आ बैठी है।

वाजपेयी जी अच्छे वक्ता, राजनेता और कवि ही नहीं, बल्कि देश को विकास की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाले युग दृष्टा के रूप में याद किए जाएंगे। अच्छे प्रशासक और विकास को लेकर स्पष्ट दिशा उन्होंने दिखाई, खासतौर से बुनियादी ढाँचे और आर्थिक क्षेत्र के साथ विदेश नीति में भी उनकी क्षमताओं का लोहा सब मानते हैं।  हालांकि बाजपेयी जी की पैठ विदेशी मामलों में अधिक थी लेकिन प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने सबसे ज़्यादा काम आर्थिक और बुनियादी ढाँचा क्षेत्र में किया। दूरसंचार के क्षेत्र और सड़क निर्माण में वाजपेयी जी के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। भारत में आजकल जो राजमार्गों का जाल बिछा हुआ देखते हैं उसके पीछे वाजपेयी जी की ही सोच है। अटल जी कुशल रणनीतिकार भी थे।

1962 के चीन के साथ युद्ध के बाद हिंदी-चीनी भाई का नारा गुम हो गया था। दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण थे। लंबे समय तक यह तनाव चला। विदेशमंत्री के तौर पर 1979 में अटल जी  चीन की ऐतिहासिक यात्रा पर गए। उनकी कुशल रणनीति से संबंध सामान्य होने लगे। पड़ोसी देशों से मधुर संबंधों के पैरोकार अटल बिहारी वाजपेयी  जी ने विदेश मंत्री के रूप में पाकिस्तान की भी यात्रा की। 1971 के युद्ध में बुरी तरह से हारे पाकिस्तान से सारे संवाद टूट गए थे। कारोबार ठप था। यहाँ भी दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने में कुशल रणनीति का परिचय दिया। साथ ही अटल जी परमाणु शक्ति की वकालत करते थे। वह निशस्त्रीकरण सम्मेलन में भी गए। शीत युद्ध का युग था। वाजपेयी जी ने भारत के परमाणु शक्ति से लैस होने की वकालत की। उन्होंने साफ कहा कि जब पड़ोसी देश चीन परमाणु हथियार से लैस है, तो भारत अपनी रक्षा के लिए इससे वंचित क्यों रहे? इस सम्मेलन में उन्होंने इस संबंध में जो दलीलें दीं, वह दमदार थीं। बाद में जब वह प्रधानमंत्री हुए, तो दूसरी बार बुद्ध मुस्कुराए, यानी परमाणु परीक्षण हुआ। भारत ने दूसरी बार पोखरण में यह परीक्षण किया। भारत की सामरिक शक्ति की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी।

एक बार मित्रता के लिए पाकिस्तान द्वारा हाथ बढ़ाने पर वाजपेयी जी ने चुटकी लेते हुए बोले कि – पड़ोसी कहते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती, हमने कहा कि चुटकी तो बज सकती है। अद्भुत अकल्पनीय अविश्वासनीय सख्सियत थे हमारे अटल जी।

और इस लेख की समाप्ति वाजपेयी जी के ही कविता द्वारा करना चाहता हूँ, साल 1988 में वाजपेयी जी जब बीमार थे तो उन्होंने यह कविता लिखी थी। उस समय वाजपेयी जी ने मानों कि मौत का साक्षात्कार किया हो।

ठन गई! 
मौत से ठन गई!
 
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
 
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।
 
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
 
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?
 
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा।
 
मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
 
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
 
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
 
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
 
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।
 
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

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