विकास से विश्वास, विश्वास से जीत

शतरंज की चालें और वास्तविक राजनीति, है कोई समानता … या भिन्नता? कहीं न कहीं राजनीति से जुड़ा हर वो व्यक्ति अगली चाल सोच रहा होता है जो थोड़ी भी महत्वाकांक्षा रखता है। यह समानता तो है। परन्तु लोकतंत्र में जनता जनार्दन है जो कि शतरंज में नहीं। बोर्ड पर रखी गोटियों को न तो स्कूल चाहिए, न ही अस्पताल और बिजली भी नहीं। राजा को किसी का विश्वास नहीं जीतना होता, बस प्रतिद्वंद्वी की चालें पढ़कर, रणनीति बना कर, आत्मविश्वास से चालें चलना हैं।

लोकतंत्र का विकास एकाएक नहीं हुआ ये तो सब जानते ही हैं। पहले राज-परिवार थे। युद्धों द्वारा सत्ता परिवर्तन हुए। फिर भारत में अंग्रेज आए। अलग अलग भू-भागों को उपनिवेश बना कर राज करने की प्रणाली विकसित की। 1947 में हम स्वतंत्र हुए, 1950 में संविधान लागू हुआ, और आधिकारिक तौर पर लोकतंत्र की घोषणा भी हुई। परन्तु एक हजार वर्ष की गुलामी में कहीं न कहीं निर्णय लेने की क्षमता हम खो चुके थे। जिसके पास सत्ता है सब उसी पर छोड़ दिया कि वो ही सब कुछ तय करे। स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस में कई बार ऐसे अवसर आए जब मुखिया तय करना सदस्यों पर छोड़ा गया। परन्तु अंत में हुआ वही जो गांधी जी या नेहरू जी ने चाहा। 1947 के बाद भी 1977 तक तो सत्ता एक ही दल के पास रही – कांग्रेस। दल के अंदर ही राजनेता शतरंज की चालें चलते और सत्ता पा लेते। उसमें भी कहीं न कहीं राज परिवार जैसी परिस्थिति ही थी। अधिकतर समय केवल एक ही परिवार का शासन रहा, जैसा पहले हुआ करता था।

1977 में पहली बार सत्ता का परिवर्तन हुआ। कांग्रेस कुछ ही दिन सत्ता से दूर रही परन्तु जनता को लोकतंत्र की ताकत का पता तो चला। केवल शतरंज की चालें अब काम नहीं आएंगी। अब जनता का विश्वास भी जीतना होगा। जैसे जैसे जागरूकता बढ़ेगी वैसे वैसे लोकतंत्र और सुदृढ़ होगा। इसका उदाहरण अब हमें बारंबार देखने को मिल रहा है। जनता का विश्वास जीत कर कितने ही राज्यों में राजनैतिक दल लगातार दो बार, तीन बार विजय प्राप्त कर रहे हैं। यह राष्ट्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। पूर्वोत्तर में हो रहा विकास इसका एकदम ताजा उदाहरण है। 2014 में केन्द्र मे भाजपा की सरकार आने के बाद पूर्वोत्तर के सीमावर्ती राज्यों में भरपूर निवेश हुआ और इसके परिणाम भी सामने आए। आज सरकार के परिश्रम से सड़कें बिजली सभी गाँवों तक पहुँची है। और जनता ने भी भाजपा सरकार में विश्वास स्थानीय चुनावों में जिताकर जताया है। विश्वास अब इतना कि जहाँ पहले अफ्स्पा जैसे कानूनों का सहारा लिया गया वहाँ अब धीरे-धीरे इसको भी हटाया जा रहा है।

यह फार्मूला अब सामने है — विकास से विश्वास और विश्वास से ही जीत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राज्यों और केन्द्र के चुनावों को एक साथ कराने की विधि भी विकास को और गति प्रदान करने वाली होगी। आशा है इस दिशा में भी शीघ्र ही कदम बढ़ाए जाएंगे और दलों की जीत के साथ-साथ भारत की जीत का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

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