उत्तराधिकारी कौन?

जीव वैज्ञानिकों के अनुसार जब शरीर एक छोटा सा काम भी करता हैं – जैसे कि कोई वस्तु हाथ से उठाना – तब हमारे संपूर्ण शरीर की करोड़ों कोशिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं। कोशिका जो शरीर की सबसे छोटी इकाई होती है, एक तय कार्य पूरी ईमानदारी से करती है तब कहीं हाथ वो वस्तु उठा पाता है। ये कोशिकाएँ ही हैं जो बाहरी आक्रमणों, जैसे संक्रमण, चोट, घावों से लड़ती हैं और शरीर को सुरक्षित रखती हैं। शरीर के बचाव कार्य में हर क्षण अनेकों कोशिकाएँ नष्ट होती रहती हैं और नई कोशिकाएँ जन्म लेती हैं, और ये नई पीढ़ी, पिछली पीढ़ी के अधूरे काम को ठीक उसी प्रकार से करती हैं जैसे पूर्ववर्ती पीढ़ी ने किया। ये अनुशासन ही हमारे शरीर को सुचारु रूप से चलाता है। यदि हमारे शरीर की एक भी कोशिका इस अनुशासन को भंग कर दे तो शरीर का क्षय होने लगता है और परिणाम भयंकर होते हैं।

जिस प्रकार कोशिका शरीर की इकाई होती है ठीक उसी प्रकार एक नागरिक समाज या देश की इकाई होता है। जागरूक और अनुशासित सक्रिय नागरिक ही स्वस्थ समाज व राष्ट्र का निर्माण करते हैं। पिछली पीढ़ी के कार्यों का उपहास करने वाले, और परंपराओं के विरुद्ध कार्य करने वाले नागरिक समाज व राष्ट्र का क्षय करते हैं। स्वस्थ और मजबूत राष्ट्र निर्माण के लिए हमें इस प्रकार की मानसिकता को बदलना होगा।

अतीत में सक्रिय नागरिकों ने देश की रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुती दी है। उस धरोहर को संजो कर रखने का काम धरातल पर किया जा रहा है। पिछले चार दशकों से पूर्वोत्तर के राज्य त्रिपुरा में चल रही राष्ट्र विरोधी वामपंथी विचारधारा का अंत हुआ। उस प्राण-घातक संघर्ष में सैंकड़ों कार्यकर्ताओं ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज उन्हीं महापुरुषों के निस्वार्थ बलिदान के फलस्वरूप पूर्वोत्तर में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का बिगुल बजा है और इसका विस्तार जारी रहेगा।

इतिहास हमारी वीरता के प्रसंगों से भरा है। सेनापति लाचित बोड़फुकन का मुग़ल कमांडर मिर्जा राम सिंह से सराईघाट का युद्ध, राष्ट्रभक्ति का अद्भुत उदाहरण है। इस युद्ध के बाद कभी मुग़लों ने अहोम राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया।

तो वास्तव में सच्चे उत्तराधिकारी वही हैं, जो अपने अतीत को स्वीकारते हैं, अपनी संस्कृति को संजोते हैं, और आने वाली पीढ़ी को अनुशासित और निस्वार्थ भाव से देश के लिए बलिदान हो जाने की भावना का संदेश दे रहे हैं।

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