सीमाओं के मायने

सदियों से बनती-बिगड़ती एवम् नया रूप लेती सीमाएँ गाथा है शौर्य की, बलिदान, त्याग, रणनीति एवम् वैचारिक दृढ़ता की। सीमाएँ गाथा इन मूल्यों के कमज़ोर पड़ने की भी है। अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर यह माना जाए कि विश्व के इतिहास की कहानी दर असल सीमाओं के बदलने की ही कहानी है। फिर चाहे वह सीमा भूमि की हो; वैचारिक प्रभुत्व की जैसा की विश्व ने द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद देखा तथा शीत-युद्ध के खत्म होने के पश्चात; या, ब्रह्मांड में अपना वर्चस्व स्थापित करने की। किसी भी राष्ट्र की परिकल्पना में सीमाओं के रेखांकन एवम् उसकी रक्षा, उसके सशक्त होने की पहली शर्त है।

पुरातन से आधुनिक काल के लिखित इतिहास में भारत की सीमाओं में अनगिनत परिवर्तन हुए हैं। आज का राजनैतिक मानचित्र भारत को 1947 के बाद से 32,87,263 वर्ग कि.मी. के दायरे में बाँधता है, जिसके उत्तर में कश्मीर प्रांत, दक्षिण में कन्याकुमारी का टापू, पूर्व में पूर्वोत्तर सीमावर्ती राज्यों की श्रृंखला तथा पश्चिम में पंजाब, राजस्थान तथा गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र हैं। आज जिसे वैश्विक मानचित्र में ‘साउथ-एशिया’ प्रांत (जिसके अंतर्गत आज कई देश आते हैं) कहा जाता है, उसे कुछ सदियों पूर्व तक हिन्दुस्तान कहा जाता था। इसलिए हिमालय के दक्षिण में स्थित इस पूरे इलाके को 1970 के दशक के पूर्व तक ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ के संज्ञान से ही संबोधित किया जाता रहा है। 1947 के विभाजन के उपरांत बने नए देश पाकिस्तान एवम् 1971 के बाद बने बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों के अमेरिकी शोध संस्थानों में लगातार विरोध के बाद ही ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ की जगह ‘दक्षिण एशिया’ के संबोधन को लोकप्रिय बनाने के प्रयासों में तेज़ी आयी। अगर राजनैतिक रूप से भारतीय सीमा को नई रेखाओं में बांधा गया था तो अब वैचारिक रूप से भी इसकी कवायद तेज़ हो चली थी।

विचारों की दृष्टि से, सीमा, जो कि आधुनिक राष्ट्र की परिभाषा के महत्वपूर्ण अंग ‘क्षेत्र’ की विशेष द्योतक है, भारतीय पुरातन लेखन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में विद्यमान रही है। इसके बारे में परोक्ष रूप से कम ही लिखा गया, परन्तु शासन व्यवस्था एवम् विदेश-नीति का कुल सार अपनी भूमि के क्षेत्रफल की रक्षा तथा विस्तार में ही छिपा था। इसमें अग्रणी रूप से कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र में ‘क्षेत्र’ की रूपरेखा तथा रक्षा का वर्णन एवम् मण्डल सिद्धांत में गुप्तचरों के माध्यम से बाह्य सुरक्षा सुनिश्चित करना था। परन्तु सहज रूप से पढ़े गए इस ग्रंथ के माध्यम से यह लक्ष्य भली-भाँति प्रस्तुत नहीं होता। एक सहज सा सवाल मन में उठता है कि राजधर्म, प्रजा-सेवा, शासन, दण्डनीति, कूटनीति, राजनीति एवम अर्थनीति पर लिखे गए विस्तृत ग्रंथ एवम् लेखनी में सीमाओं की सुरक्षा को लेकर विशेष प्रसंग क्यों नहीं लिखे गए? क्या उन्हें सीमाओं की रक्षा की चिंता नहीं थी? आखिर क्या कारण था कि विद्वानों की दृष्टि से यह अति महत्वपूर्ण विषय लगभग दूर हो गया?

इसका प्रमुख कारण यह है कि वर्त्तमान में सीमाओं की आधुनिक परिभाषा और प्रारूप उस काल से काफ़ी भिन्न है। आधुनिक काल में सीमाएँ, राष्ट्र के क्षेत्रफल को रेखांकित करती वह लकीरें हैं जहाँ राष्ट्र की संप्रभुता ‘समाप्त’ होती है। राष्ट्र की ऐसी परिकल्पना मूलतः यूरोपीय है। 1648 ईस्वी में वेस्टफेलिया संधि के पश्चात उपजा राष्ट्र है, जिसे ‘राष्ट्र-राज्य’ के रूप में जाना गया। आज पूरे वैश्विक अन्तर्राष्ट्रीय संबन्धों की मुख्य कड़ी यही आधुनिक राष्ट्र है। किन्तु सनातनी परम्परा में राष्ट्र की संप्रभुता ना तो इसके क्षेत्रीय सीमाओं में सिमट कर रहती थी ना ही इसकी वैचारिक परिकल्पना ऐसी थी। यह सत्य है कि भारत कई महान जनपदों में बँटा हुआ था। परन्तु सनातन संस्कृति के ध्वजारोहक इस राष्ट्र की कीर्ति इन सारे जनपदों को भेदती हुई कई ऐसी जगहों में फैली जो आज अलग आधुनिक राष्ट्र है। भारत एक विचार था जिसकी सीमाएँ असिमित तथा कीर्ति, कृत्रिम राजनैतिक एवमं कूटनीतिक रेखाओं का मोहताज नहीं थी। पश्चिम में मिले संस्कृत बोले जाने के प्रमाण, अफ्गानिस्तान से मिली बौध प्रतिमाएँ, पूर्व एवम् दक्षिण-पूर्व के देशों में अनगिनत हिन्दू मंदिर एवम् भारतीय परम्परा की अमिट छाप, इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्र की असल सीमा क्षेत्रीय मात्र ना होकर, वैचारिक भी थी।

पिछले दो साल से देश में चल रही राष्ट्रवाद की बहस में यही मुद्दा गरमाता रहा है कि भारत की एक राष्ट्र के रूप में परिकल्पना मिथ्या है। यह एक भ्रांति है जो उन लोगों द्वारा फैलाई गई जिन्हें भारत राष्ट्र की व्यापकता का मान ही नहीं हो पाया। जिन गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की दुहाई देकर उनके ‘राष्ट्र’ के विरोध में लिखे गए संदर्भों को पेश किया गया, दुहाई देने वाले वो लोग ये नहीं पढ़ पाए कि जिस राष्ट्र के गुरुदेव विरोधी थे, वह युरोपीय था, वह राष्ट्र ‘नेशन’ था। परन्तु वह उस राष्ट्र के निरंतर साथ थे जो सीमाओं से परे सभ्यता की लौ से संसार को प्रकाशमय बना रहा था। किन्तु गुरूदेव कवि थे। वह जिस काल में राष्ट्र की उस परिभाषा को दुनिया को बता रहे थे जो भारतीय दर्शन की देन थी, वह या तो भूतकाल का था या अनदेखे सुदूर भविष्य का।

इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि आज पूरा विश्व ही युरोपीय राष्ट्र की परिभाषा में गढ़ित है। और अगर राष्ट्र की यही परिभाषा उसकी अखण्डता और संप्रभुता को सुनिश्चित करती है तो सीमाओं की रक्षा ही परम कर्तव्य है। भारत की वर्तमान सीमा दो भागों में विभाजित है – भूमि सीमा जो 15,106.70 कि.मी. लम्बी, और समुद्रीय सीमा जो 7,516.6 कि.मी. लम्बी है। अगर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, हरियाणा और दिल्ली को छोड़ दें तो देश के सारे राज्य सीमावर्ती राज्यों की श्रेणी में ही आते हैँ। दक्षिण एशिया के सात देशों की सीमाओं से अपनी सीमाएँ साँझा करता यह देश कुछ कम दर्दनाक इतिहास और सोचनीय वर्तमान से नहीं जूझ रहा।

कुछ-एक देश का अपवाद छोड़ दें तो भारतीय सीमाओं की रक्षा चुनौतिपूर्ण ही प्रतीत होती है। बात सिर्फ रक्त का बलिदान कर कुछ-एक वर्ग भूमि की रक्षा की ही नहीं, बल्कि देश के गौरव और मान की भी है। 15,106.7 कि.मी. की स्थल सीमा का अधिकांश भाग शत्रुओं से घिरा है। भारत-बांग्लादेश के बीच ‘अंतर्राष्ट्रीय सीमा’, भारत पाकिस्तान के बीच ‘रैडक्लिफ लाइन’, भारत-चीन को बाँटती ‘मैकमोहन लाइन’, भारत-नेपाल और भारत-म्यांमार के बीच की सीमा, वो सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारतीय सैन्य बल की अधिकांश ऊर्जा संदिग्ध गतिविधियों को रोकने और सीमा की रक्षा में जाती है। इस कारण यहाँ बसने वाले लोग तथा उनकी उन्नति पर कम ही ध्यान केंद्रित हो पाता है क्यूंकि प्राथमिकता हमेशा बाहरी खतरे द्वारा तय की जाती है। लेकिन सही मायने में सबसे बड़ी चुनौती यही है। सीमा के रक्षा की सार्थकता इस बात से साबित होती है कि सीमा के अन्दर रह रहे लोगों में शांति और खुशहाली का माहौल स्थापित किया जा सके।

हाल ही के दिनों में वैश्विकरण बनाम राष्ट्रवाद की बहस में तेज़ी आई है। जहाँ 90 के दशक में प्रारम्भ हुए वैश्विकरण के दौरान वैचारिक प्रभुत्व को अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के परे स्थापित करने की होड़ थी, वहीं अमेरिकी वर्चस्व के कमज़ोर पड़ने के बाद उसे रफ्तार धीमी करनी पड़ी। साथ ही, युरोप में उभरते राष्ट्रवाद की लहर ने इस पर कुछ हद तक लगाम लगाई है। किन्तु अब वर्चस्व की लड़ाई सार्वजनिक एवम् प्रत्यक्ष ना होकर कई अपरोक्ष माध्यमों से स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। मीडिया, फिल्में, लोक संस्कृति, अंतरिक्ष तकनीक, तकनीकी आदि माध्यमों से लैस बलशाली एवम प्रभावशाली देश अपना प्रभुत्व कायम कर रहे हैं। इस पूरी बहस का निचोड़ अगर हम समझें तो उसी मुद्दे पर आ जाते हैं जहाँ से यह लेख प्रारम्भ हुआ था – सीमाएं द्विस्वरूपी है – एक भौतिक, तो दूसरा वैचारिक। दोनों आयामों की रक्षा एवम् समृद्धि ही किसी भी राष्ट्र की सीमाओं को पूर्ण रूप से लामबंद करती है।

भौतिक सुरक्षा को लेकर हमारे देश में एक बड़ा तंत्र कार्य कर रहा है, लेकिन क्या हम सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास की पहल के लिए पूर्वोत्तर राज्यों को आवंटित बजट की तर्ज पर एक नया खाका तैयार कर सकते हैं? वैचारिक पक्ष पर तो शुरुआत हमने कर दी है। गत माह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भारतीय धरोहर को संरक्षित एवम् पोषित करने वाले व्यक्तियों को भारतीय नागरिक सम्मान से सुशोभित करना एक ऐसा शंखनाद है, जो एक सुनहरे बलशाली भारत का आह्वान करता प्रतीत हो रहा है। चुनौतियाँ हैं, तो संभावनाएँ भी अपार है।

About प्रिया शर्मा

प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय

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One Comment on “सीमाओं के मायने”

  1. “सीमाओं के मायने” प्रिया जी शर्मा का सारगर्भित लेख भौतिक व वैचारिक सीमाओं के मायने बताता हैं। सीमा प्रान्तों के अल्पविकास के मद्दे को उज़ागर करता हुआ यह लेख लेखिका के उत्कृष्ट सृजनशीलता व उनकी बुद्विमता का उल्लेखनीय पक्ष उजागर करता है। लेखिका के अनुसार किसी राष्ट्र कि प्राथमिकता उसकी अपनी शर्तों पर केवल तभी संभव है जब उस देश के बुद्धिजीवी और नागरिक अपनी सभ्यता व संस्कृति द्वारा स्थापित मुल्यों को जीवंत रखते हुए उन्हें भावी पीढ़ी को विरासत में दे।
    धन्यवाद।
    सुनील सिहाग(पूर्व वायुसैनिक)
    अध्यक्ष
    गौरां फाउंडेशन ट्रस्ट, नेतेवाला
    श्री गंगानगर, राजस्थान
    96496 96497

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