सीमाओं के रक्षक – हमारे संत महापुरुष

चर्चा करते करते कितने ही महापुरुष याद आ जाते हैं जिनके द्वारा सम्पूर्ण किए गए कार्यों की आज के परिवेश में कल्पना तक कर पाना कठिन है। जहाँ एक ओर कश्मीर घाटी में पाकिस्तान घुसा चला जा रहा था वहीं कैसे लद्दाख आक्रांताओं से बचा रहा? किनके प्रयासों से पूर्वोत्तर के प्रांत बचे रहे? अलगाववाद के स्वर 1947 में अनेकों रियासतों में गूंज रहे थे। अपवादों को छोड़ें तो कैसे एकाएक सब शान्त पड़ गए? आखिर किनके प्रयासों से? राजनैतिक सीमाओं के रेखांकन का इतिहास पढ़ेंगे तो साधारण से दिखने वाले अनेकों ऐसे व्यक्तित्व सामने आएंगे जिन्होंने असाधारण कार्यों को पूर्ण किया।

सीमाओं पर संकट तब भी थे आज भी हैं। केवल राजनैतिक इच्छाशक्ति से लड़ाइयाँ नहीं जीती जा सकती। जब तक समाज वैचारिक रूप से साथ न हो तो विजय पाना असंभव ही है। समाज को एक विचार में पिरोने का काम कर रहे ऐसे ही हैं हमारे धर्मगुरू ‘उन्नीसवें कुशोक बकुला श्रीमान लोबजंग थुबतन छोगनोर’। जिन्होंने राजनैतिक स्तर पर भी अपनी दृढ़ता का अभूतपूर्व परिचय दिया। कश्मीर की उन परिस्थितियों में भी जिस निर्भयता के साथ ‘जम्मू एवं कश्मीर’ की विधानसभा में भारत में सम्मिलित होने की बात कही वह अप्रतिम है।

न केवल भारत में, बल्कि मंगोलिया में भी कुशोक बकुला जी के योगदान का स्मरण आज भी वे करते हैं। मंगोलिया एक प्रकार से अपने मूल को भूल ही चुका था। वहाँ के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गाथा भी अद्भुत है। बिना किसी सेना के, बिना किसी हथियार के, केवल हृदय-परिवर्तन के आधार पर मंगोलिया में राजनैतिक बदलाव संभव कर दिखाया।

इस अंक में कुशोक बकुला जी के व्यक्तित्व को हम एक साक्षात्कार के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे। सोनम वांगचुक जी 25 वर्षों तक कुशोग बकुला जी के साथ कार्यरत रहे। मंगोलिया में भी वे उन्हीं के साथ थे। ‘सीमा संघोष’ की टोली को सोनम जी के साथ भेंट का अवसर मिला। जिसका कि हम आभार व्यक्त करते हैं। कुशोक जी के जीवन से जुड़ी बहुत सी जानकारियाँ आपने हमें विस्तार से दी। आशा है कुशोक बकुला जी का यह परिचय पाठकों को उनके बारे में और अधिक जानने के लिए प्रेरित करेगा।

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